Saturday, May 2, 2020

मिनी कहानी

क ही गाँव के स्कूल में एक ही क्लास में हम दोनों साथ पढ़ा करते थे और वो भी पहली कक्षा से ही। उन दिनों मैं बहुत ही छोटा था मैं अपनी फूफी के साथ स्कूल जाया करता था और वो भी अपने दीदी के साथ जाती थी लेकिन कभी भी हम-लोग साथ नहीं जा सके क्योंकि हमारे घर अलग-अलग थे। किलोमीटर का फ़ासला था हमारे घर के बीच तो हमारे लिए दूरियाँ तो बहुत थी।

समय बीतता गया और हम दोनों एक दूसरे करीब आते गए। बचपन से ही हमने एक दूसरे को देखा और समझा था। हमारी दोस्ती न जाने कब एक नए रूप में बदल रही थी हमें भी नहीं पता था। चौथी क्लास की बात है जब मैं उसके लिए सर से बहुत मार खाया था और आज भी याद किया करता हूँ तो लगता है कि वो भी क्या दिन थे।

लाखों दुर्गुण हों मुझमें किन्तु मेरा सबके लिए प्रेम को देखकर उसके मन में मेरे प्रति अलग ही भावना बन चुकी थी। हम तो ठहरे बच्चे, हमें तो न दुनियादारी का पता था और न ही ये पता था कि जो हम कर रहे हैं उसे ही प्यार कहते हैं।

एक दिन हम दोनों को ही यह समझ आ गया कि हम जो कर रहे हैं वही प्यार है। फिर क्या था हमने छुप-छुप कर बातें करनी शुरू की। अब हम कभी क्लास के और बच्चों के सामने बात तक नहीं किया करते। उसका तो पता नहीं लेकिन मेरे दोस्तों ने तो मुझे चिढ़ाने का ठेका लिया था। मैं तो उससे बात तक नहीं करता था लेकिन मेरे उन दोस्तों ने न जाने कितने ख्वाबों को मेरे सामने ऐसे पटक दिए जो लगता था कि, किसी लंबी दूरी के मुसाफ़िर के सर का एक बहुत ही भारी बोझ है और मंज़िल तक वह पहुँच कर बोझे को पटक दिया है। लेकिन फिर हम-लोग शिक्षक के आते ही तुरंत ही आसमान से ज़मीन पर गिरते और हमारे ख़्वाब पल भर में टूट जाते।

उस दिन हमारे स्कूल में आये आठ वर्ष बीत चुके थे हम-दोनों ने मन ही मन साथ ही आगे पढ़ने का मज़बूत इरादा बना लिया था। उस दिन मैंने अपने शहर के सबसे नामचीन स्कूल में नामांकन के लिए फॉर्म भर दिया था हमारा स्कूल एक साल पहले ही दसवीं कक्षा तक बना था और वहाँ बेहतर शिक्षकों की उपलब्धता नहीं थी तो हमने काफी सोच समझकर फैसला लिया कि नवीं में शहर के स्कूल में नामांकन ली जाए। क्लास की सबसे अव्वल आने वाली लड़की थी वह, आठवीं में उसने पूरे क्लास ही नहीं बल्कि पूरे स्कूल में टॉप किया था। मैं दूसरा स्थान पर आया था यही सोचकर हम-दोनों ने आगे नवीं में शहर के स्कूल में नाम लिखवाने का फैसला लिया था।

उस समय सभी अपने-अपने अंक-पत्र लेकर बारी-बारी से जा रहे थे। वह अपने दोस्तों के साथ क्लास के दरवाज़े पर खड़ी थी। उसी समय मैं खिड़की पर खड़ा था तो मैंने उसे रुकने का इशारा किया तो उसने अपने दोस्तों से बहाना बनाकर मेरा इंतज़ार किया। हमारी बातचीत काफी दिनों के बाद हुई थी तो पता नहीं कितने समय तक हुई। फिर हमने अपने नए स्कूल में मिलने की योजना बनाई ताकि वहाँ हमें कोई जान भी तो नहीं सकता है उसने हामी भी भर दी थी।

वो दिन आ चुका था जिसका मैं बेसब्री से इंतज़ार कर रहा था। आज मैं बस उससे मिलकर बातें करने के लिए करीब घंटे भर पहले स्कूल गया था। बहुत देर इंतज़ार करने के बाद भी वो नहीं आयी। मैंने उसे क्लास में भी ढूँढा लेकिन वो मिली नही आखिरकार मैं सभी जगहों पर उसे ढूँढ कर थक चुका था। उस दिन मैं घर आ गया। अगले दिन में उसके घर से होते हुए ही गुज़र रहा था तो मैंने उसे दरवाज़े पर देख लिया लेकिन मुझे देखते ही वो अंदर चली गई। वह मुझे खिड़की से छुप कर देख रही थी मैंने भी उसे छुप कर देखते हुए देख लिया था लेकिन मैं लोगों को देखकर उसे कुछ भी नहीं कह पाया। मुझमें कभी इतनी हिम्मत ही नहीं हुई कि मैं उससे कभी कुछ पूछ पाता।

अब तो मेरा रोज़ सुबह का यही काम हो गया था और वो भी खिड़की पर मेरा इंतज़ार किया करती थी। मैं स्कूल तो सब दिन जाया करता था घर से निकलने के लिए बहाने भी बना लेता रविवार को लेकिन मैंने कभी उन दो सालों में उससे ये तक पूछने की हिम्मत नहीं कि वो स्कूल क्यों नहीं आ पाई? उसकी कभी खत्म न होने वाली इस उदासी का क्या कारण है?

मैंने अब दसवीं की परीक्षा दे दी और परीक्षा देते ही अपने ननिहाल चला गया। वहाँ मुझे अच्छा नहीं लग रहा था लेकिन क्या करता? मैं पन्द्रह दिन बाद लौटा वहाँ से तो एक दिन फिर उसके घर की तरफ चल पड़ा पर आज वो नहीं दिखी शायद मैं गलत समय चला आया होऊँगा ये सोचकर मैं वापस चला आया। उसके बाद मैं कई दिनों तक उसके घर तक जाता रहा लेकिन उसका कोई पता और ठिकाना नहीं मिल सका। मैं चाहता तो उसके परिजनों से पूछ सकता था लेकिन मैं पूछने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। उसके लिए किसी से बातें करने में मैं डर रहा था।

फिर एक साल बाद गाँव के एक मेले में वो मिली थी लेकिन इस बार वो कुछ बदली-बदली सी लग रही थी। उसका लिबास उसका चेहरा और उसका शरीर सब कुछ अलग सा लग रहा था। मैं मेले के भीड़ को चीरता हुआ उस तक पहुँचा तब क़रीब से उसे देख पाया। इसबार उसमें अपनापन नहीं ढूंढ पा रहा था मैं। उसकी चूड़ी, सिन्दूर और उसके सारे श्रृंगार उसके किसी पराये के हो जाने का दावा कर रहे थे। आज मैंने काफी हिम्मत जुटाई तो बस इतना पूछ सका कि कैसी हो? जवाब आया अच्छी तो नहीं हूँ लेकिन अब कर ही क्या सकते हैं? उसके जवाब में छिपा हुआ प्रश्न मुझपर कई दफा और कई गुणा अधिक भारी सा प्रतीत हो रहा था जो किसी रसायन के सबसे बड़ा समस्या के भाँति प्रतीक हो रहा था। मैं उससे पूछा कि उस दिन तुम स्कूल क्यों नहीं आयी? फिर उसका एक सवालनुमा जवाब था कि तुमने बड़ी देर कर दी पूछने में शायद तुम पहले इस बारे में पूछ सकते थे?

मैं फौरन वहाँ से लौट चुका था। अपनी ही नज़रों में मैं बहुत बड़ा गुनहगार बन चुका था। चौथी कक्षा का सबसे कमज़ोर लड़का जो अपने शिक्षकों से सवाल पूछते-पूछते आठवीं कक्षा का दूसरा स्थान पाने वाला बन गया वो किसी लड़की के ज़िन्दगी को बदलने के लिए एक प्रश्न नहीं पूछ सका। वो लड़की जो बचपन से एक डॉक्टर बनना चाहती थी वो मेरे कारण दसवीं न कर पाई। आज मेरे पास सवालों की एक लम्बी सी कतार है पर जबाब एक भी नहीं।
-------------धन्यवाद--------------
-रंजन कश्यप

नोट- ये कहानी 'योरकोट स्टोरी राइटिंग मंथ' में दी गई एक चैलेंज पर आधारित है जिसे लेखक के द्वारा एक कहानी का रूप दिया गया है। इस कहानी का वास्तविकता से संबंध महज एक संयोग मात्र है यह कहानी बस एक कल्पना पर आधारित है। इस महीने में आपको करीब इकतीस छोटे-बड़े कहानियों का संग्रह मिलेगा और भी बहुत सारे पढ़ने के लिए हमसे जुड़े रहें।

और पुराने कहानियों को पढ़ने के लिए आप नीचे दिए गए लिंक पर जा सकते हैं। 👇
मैथिली कहानियों के लिए इस लिंक पर जाएं👇
योरकोट पर रचनाओं को पढ़ने के लिए इस लिंक पर जाएँ 👇

4 comments:

ज़ोया

आ ज के दिन (15 मई 2020) साल भर पहले कुछ खास था और यदि कोई मेरे साथ पढ़ रहे होंगें तो उन्हें बखूबी याद होगा। हमारा बचपन से शौक था कि कब आइए, ब...