तो हम सुबह चलते जा रहे थे। उस दिन सुबह कुछ अच्छा सा लग रहा था क्योंकि सुल्तानगंज से देवघर तक पैदल जाने का वो तीसरा दिन था। सुबह चार बजे महादेव को याद कर चलना शुरू किया था। दो घंटे तक लगातार चलने के बाद एक चाय की दुकान खुली हुई थी वहाँ मेरे साथ के लोगों ने चाय पीना शुरू कर दिया। वो लोग इस बेहतरीन चाय की बहुत तारीफें किये जा रहे थे लेकिन फिर भी मैं उससे आकर्षित नहीं हो पाया क्योंकि बचपन से ही हमें चाय नहीं पसंद थी। फिर मेरे एक चाचा जी ने जबरदस्ती मुझे चाय पिलाई ये कहकर कि पी लो शायद फिर ये चाय कभी न मिले। मैंने मना कर दिया लेकिन उन्होंने फिर से जबरदस्ती की और कहा इस पहाड़ी पर चलने की थकावट को ही देखते हुए ये चाय पी लो शायद थकान दूर हो जाय। मैंने भी बड़े बुजुर्गों की बात मानकर चाय का एक ग्लास उठाया और पीना शुरू कर दिया सचमुच ही अद्भुत चाय थी। वो एक बुजुर्ग व्यक्ति था जिसका पहाड़ी पर एक छोटा सा दुकान था जो देखने में बिल्कुल अच्छा नहीं था उसने कुछ भैंस और गाय पाल रखे थे। वह व्यक्ति अपने गाय और भैसों को पास ही चराया करता था। उस समय ही वह भैंस का दूध निकाल कर लाया था जिससे उसने बेहतरीन चाय बनाकर हमलोगों को दिया।
मालिक आज पीकर देखो शायद फिर कभी इस रास्ते से जाओगे तो यहाँ मेरी टपरी ढूँढते जाओगे। सचमुच पहले झूठ लगती हुई ये बातें चाय की घूँट लेने के बाद बहुत अच्छी लग रही थी। और फिर मैं वहाँ चाय पीकर निकल पड़ा। अगले चार-पाँच दिनों में मैंने उस तरह के चाय की खोज बहुत जोर-शोर से की लेकिन वो स्वाद फिर नहीं मिला। घर आकर कितनी दफ़ा खुद बनाने का और बनवाने का भी प्रयास किया लेकिन सफलता हाथ नहीं लगी। मैंने फिर से चाय पीना छोड़ दिया। वो ही मेरी आखिरी चाय हो गई। न ही पहले पीता था और न अब पिऊँगा। अब यदि फिर वहाँ जाने का मौका मिले और वह व्यक्ति जिंदा हो तो जरूर पिऊँगा।
नोट- यह कहानी योर कोट स्टोरी राइटिंग मंथ के चैलेन्ज पर आधारित है लेकिन ये वास्तविक है जो मेरे जीवन से मिलता जुलता है।
धन्यवाद🙏
- रंजन कश्यप
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