बनारस की गलियों में अगर कुछ बेहतरीन है तो वो वहाँ का ईश्वरीय माहौल। लेकिन गलियाँ तो गलियाँ हैं काफी सँकरी और ऊपर से बालकनी तो मानो हमेशा सामनेवाले के कुछ करीब जाने को उत्सुक। अगर आमने-सामने बालकनी में खड़े हो जाएं तो हैंडशेक कर लें मात्र इतनी सी दूरी। चौबीसों घंटे लगातार किसी न किसी मंदिर से घंटे की आवाज़ एकदम भक्तिमय माहौल रहा करता है। बनारस में कुछ दिन रहा और इन दिनों एक रिश्तेदार के यहाँ रह कर प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी में लगा हुआ था।
हम बिहार के एक छोटे से गाँव के रहने वाले थे और महादेव के भक्ति में पढ़ाई से भी ज्यादा यक़ीन था, तो हमारे लिए एक ऐसा शहर ही ठीक था जहाँ एक अच्छे से कोचिंग संस्थान से ज़्यादा मेरे लिए महादेव का होना जरूरी था। विश्वनाथ मंदिर से कुछ ही दूरी पर हम रहा करते थे। शाम को कुछ भी हो जाए लेकिन क्रिकेट खेलना हम लोगों की आदत बचपन से होती है तो हम अपने रिश्तेदार के छोटे बच्चों को लेकर बालकनी में ही शार्ट बाउंड्री शुरू कर दिया करते थे। अक्सर खेलते हुए सामने के बालकनी में गेंद का चला जाना तय हुआ करता था और सामने के घर में कोई रहता भी नहीं था एकदम खाली सा तो कोई दिक्कत भी नहीं होती गेंद लाने में। गाँव में तो हमारे खुद के घर पर एक छोटा सा मैदान हुआ करता था लेकिन यहाँ बालकनी मैदान ही था तो उसी में वानखेड़े बन जाता।
एक शाम हमलोगों ने खेलना शुरू किया और रोज़ की तरह गेंद फिर सामनेवाले के बालकनी में और चंद मिनटों में हम भी अपने बालकनी से उस बालकनी में छलांग लगा चुके थे। लेकिन आज तो हद्द हो गई गेंद कुछ ज्यादा ही भीतर चली गई। अरे, यह रूम तो बंद होता था तो फिर कैसे इसका दरवाज़ा आज खुला है? मैंने अंदर झाँका खिड़की से तो मुझे एक लड़का दिखाई दिया जो उम्र में मुझसे कुछ छोटा होता। मुझे तो आश्चर्य हुआ कि इस बंद पड़ चुके घर में आज कौन आया है? तब तक कानों में एक लड़की की मधुर आवाज़ टकराई लेकिन वो मधुर आवाज़ थोड़ी ही देर में एक कर्कश रूप ले लिया। फिर प्रश्नों का शिलशिला शुरू हो चुका। कि दूसरे के घर में झाँकने की क्या आदत है? कहाँ से आये? मेरे घर में घुसने की हिम्मत कैसे हुई? मैं न कुछ बोल रहा था और न ही वह बोलने दे रही थी मैं बस उसे ही देख रहा था। पाँच मिनट बाद वो चुप हुई तो मेरी नज़र गेंद पर पड़ी मैंने उठा लिया गेंद को और माफ़ी मांग कर फिर बालकनी होते अपने रूम तक पहुँचा। मैं गेम को कैंसिल कर के बालकनी में बैठे-बैठे उसका इंतजार कर रहा था और वो रात में आई तो उससे माफी मांग लिया मैंने। मुझे नहीं पता था कि आपलोग आए हैं नहीं तो पूछकर आता या गेंद देने के लिए कहता मैंने कहा। उसने भी प्रवक्ता के तरह प्रवचन दे दिया और मुझे सॉरी मिल गई।
अब शाम को क्रिकेट का कीड़ा काटने पर भी क्रिकेट नहीं खेलते। थोड़ी-थोड़ी सामने वाली से जान पहचान हो गई तो उससे ही बातचीत हुआ करती थी। बातों में ही पता चला कि वो दो दिन पहले अपने पिता और भाई के साथ बिहार से ही यहाँ आयी है। उसके पिताजी का ट्रांसफर इसी शहर में हुआ है। फिर हमारी बातें तो रोज़ चलने लगी। उसके छोटे भाई के लिए मैंने स्कूल बताई वही जिसमें मेरे रिश्तेदार के बच्चे पढ़ते थे। मैं एक लुटेरा की तरह उसके घर में घुस गया था तो उसकी नज़रों में सरीफ बनने की पूरी कोशिश में लगा था। और कुछ दिन में ही इस मकसद मे कामयाब भी हो गया। उसके घर रोज़ का जाना हो गया मेरा। उसके छोटे भाई को ट्यूशन देने के बहाने।
एक दिन मैंने उसे भी अपने ही साथ पढ़ने को कहा और वह मान भी गई। हम दोनों ने तय किया कि होली के बाद गाँव से आते हैं तब पढ़ेंगे। फिर होली आयी तो हम सब अपने-अपने गाँव जा चुके थे। चार-पाँच दिन बाद लौटे तो हालात ही कुछ बदल से गये थे इस शहर के। अब किसी के मुँह से न तो भगवान का नाम निकलता था न ही कुछ और। बस केवल कोरोना और कोरोना। हम सब भी वाराणसी आ चुके थे। अब तो मूर्ख आदमी भी कोरोना पर भरपूर प्रवचन दे रहा था। हमारे कोचिंग क्लास बन्द कर दिए गए थे और बच्चों के स्कूल भी। अब तो पछतावा भी हो रहा था और नहीं भी। वो कोरोना के डर से आई ही नहीं मेरा भी उससे कोई व्यक्तिगत संपर्क नहीं था। तो रोज़ सुबह-शाम बालकनी में जाकर उसे याद कर लिया करता हूँ।
धन्यवाद🙏
-रंजन कश्यप
नोट- ये कहानी 'योरकोट स्टोरी राइटिंग मंथ' में दी गई एक चैलेंज पर आधारित है जिसे लेखक के द्वारा एक कहानी का रूप दिया गया है। इस कहानी का वास्तविकता से संबंध महज एक संयोग मात्र है यह कहानी बस एक कल्पना पर आधारित है। इस महीने में आपको करीब इकतीस छोटे-बड़े कहानियों का संग्रह मिलेगा और भी बहुत सारे पढ़ने के लिए हमसे जुड़े रहें।
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