Saturday, May 16, 2020

ज़ोया


ज के दिन (15 मई 2020) साल भर पहले कुछ खास था और यदि कोई मेरे साथ पढ़ रहे होंगें तो उन्हें बखूबी याद होगा। हमारा बचपन से शौक था कि कब आइए, बीए में जाएँ? क्योंकि ये बचपन से सुनता आया था जब कभी भी स्कूल या कोचिंग एक कॉपी के साथ जाया करता तो कोई न कोई ये कहकर टोक देता था कि एकही कॉपी ले जा रहे हो आइये,बीए में हो क्या?

इतिहास बना था पिछली बार, जब हमारे विश्वविद्यालय ने समय पर रिजल्ट घोषित की और ये ही नहीं बल्कि बिहार का टॉप यूनिवर्सिटी भी बन चुका था। जहां लोग बस मिथिला यूनिवर्सिटी का नाम सुनकर काँप जाते थे वहीं यूनिवर्सिटी का इस क़दर प्रदर्शन करना बहुत बड़ी बात थी। कभी इसी यूनिवर्सिटी ने हमें पार्ट वन डेढ़ साल में करवाया था और पार्ट टू दो महीने में खैर छोड़ते हैं बीती हुई बातें हैं। हम भी इसी यूनिवर्सिटी के एक कॉलेज (सी. एम. साइंस) में भौतिकी से स्नातक कर रहे थे। और 15 मई का ही समय दिया गया था हमारे रिजल्ट घोषित के लिए। फिर क्या था एकदम दिल को धकधकाते हुए शाम में बैठ चुके थे अपने फाइनल रिजल्ट को देखने के लिए। लेकिन सैकड़ों प्रयास के बाद भी देख ही नहीं पाया। पिछले दो पार्ट में जहां रिजल्ट के अंक मोबाइल पर मैसेज किये गए थे वहीं इस दफ़ा इस तरह की कोई व्यवस्था ही नहीं थी।

शायद शाम को रिजल्ट देने का मतलब रात का सुकून छीनना होता है। क्योंकि जो साल भर कुछ नहीं पढ़ा लिखा वो भी उस दिन अच्छे रिजल्ट का दावा करता है ठीक मोदी जी के अच्छे दिन के आने की तरह। सुकून तो छीनना होता ही है एक कारण ये भी होता है कि शायद साथ बेंच पर बैठकर कॉपी माँगने वाली जिसको बिना कोई शर्त के हम रांझणा बने दे देते हैं वो अब कल के बाद फिर कभी शायद न दिखे। उसी ज़ोया को कॉपी देने में कभी ये नहीं पता चला कि उस दिन पांचवें पत्र में सातवें पत्र के प्रश्न पूछ दिए गए लोग बॉयकॉट करने के लिए सुकून खो रहे थे और मुझे तो बस उसे देखना था। कल तो सरजी को जरूर मिठाई खिलाने आएगी अक्सर उन लड़कियों का रिजल्ट अच्छा ही होता है। अब बीए पास करने के बाद तो सबको साथ पढ़ना भी तो नहीं है न। शायद वो शादी ही कर ले। लेकिन सरजी के साथ उसका बॉन्डिंग उनको रिजल्ट के अगले दिन खींच जरूर लाता है सरजी को भी तो उनके सामने लौंडों को.... अब छोड़िये क्या कहें। बाँकी मेरे जैसे कुछ लौंडों का इच्छा तो सरजी के मिठाई पर भी कंसन्ट्रेट होता है जैसे आमिर खान का मटर पनीर पर था।

इस रात को मेरा भी सुकून छिन गया था। आज जीवन में तीसरा एकेडेमिक रिजल्ट आ रहा था मेरा, और इतिहास गवाह है कि बिहार में कोई भी रिजल्ट आता है तो इंटरनेट साइट एकदम से रुक जाता है जैसे वो लोगों से खुद का मार्कशीट खुद तैयार करने को कह रहा हो। हम खुद का रिजल्ट नहीं देख पाए लेकिन खाना दबाकर खाये। सोने गए तो कुछ दोस्तों का स्टेटस और पोस्ट देख रहे थे और समय आगे बढ़ रहा था लेकिन रिजल्ट नहीं दिख रहा था। इस बार मन में कोई डर नहीं थी जैसे पहले दो (दसवीं, बारहवीं) में हो रहा था। शायद यही स्नातक होने का बोध करवा रहा था। रात के 1:10 बजे और रिजल्ट देखा तो खुशी मिली और जोर से चिल्ला कर घरवालों को बताया फिर वही कुछ पुराना सा टिप्पणी। लेकिन इस बार टिप्पणी में भी कहने का उनका नज़रिया बदल चुका था जहाँ पहले वो कहते थे कि ये तो दसवीं है बारहवीं अच्छे से पास करो तब समझेंगे, ये तो बारहवीं है बीए पास करो तब जानेंगे, वहीं इसबार उनके कथन जिम्मेदारी का एहसास करवा रहे थे, ये तो बस बीए था और हमें पता था कि तुम अच्छा कर ही लोगे अब कहीं एक नौकरी ले कर दिखा दो तब जानेंगें।

तब से एक नई मंज़िल के ओर निकल चुका हूँ।
किशोर कुमार जी याद आ रहे हैं हमेशा,
एक छोटी सी नौकरी का तलबगार हूँ मैं,
तुमसे कुछ और जो माँगूँ तो गुनहगार हूँ मैं।

नोट- इस कहानी का वास्तविक जीवन से कोई संबंध नहीं है ये सब महज एक काल्पनिकता पर आधारित है ये सभी लेखक के निजी विचार हैं जिन्हें कहानी का रूप दिया गया है।

                            धन्यवाद🙏
                                                 - रंजन कश्यप

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ज़ोया

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