Monday, September 17, 2018

अधूरा प्यार


चानक उसे पता चला कि जिससे मैं प्यार करता हूँ उसकी तो शादी हो रही है।यह ख़बर सुनते ही किशोर पूरी तरह से टूट गया था।हालाँकि किशोर ने ये बातें अपने भांजे से सुनी थी उसे विश्वास तो नहीं हो रहा था लेकिन उसे अपने भांजे को देखकर ये भी यकीन था कि यह झूठ नही बोलेगा,क्योकि इतना छोटा बच्चा झूठ नही बोलता।और फिर इस बच्चे को तो हमारे बारे में कुछ पता भी नहीं है।ये बात सुनने के बाद झट से किशोर ने अपनी बहन श्रेया से पूछा कि दीदी क्या तुम्हारे यहाँ किसी की शादी हो रही है?दीदी ने उसे कहा हाँ।अगले क्षण हीं उसका दूसरा प्रश्न दीदी के सामने था कि किसकी शादी हो रही है।वह जानता तो था ही पर उसे कहीँ से एक उम्मीद की किरण नज़र आ रही थी कि कहीँ दीदी का जबाब उसके बारे में न हो जिससे वो प्यार करता है,परन्तु उसकी उम्मीद की किरण पूरी तरह से दीदी के जबाब के साथ खत्म हो गयी।
              मैं कल अपने दीदी को लेकर उसके गाँव जाऊंगा तो मैं रेणुका से बात करूँगा कहीं बात बन जाये।मैं उसके पिताजी से बात करूँगा उसके भैया से बात करूँगा मैं सबसे बात करूँगा लेकिन उसी से शादी करूँगा आखिर मुझे भी सरकारी नौकरी है उसके पिताजी उसकी शादी मुझसे ही करेंगे ये सब सोचते हुए किशोर को पूरी रात नींद नहीं आयी।किशोर की दीदी की जिस समय शादी हुई थी तब किशोर १४-१५ साल का था और रेणुका १३साल की तब से ही दोनो एक दूसरे से प्यार करते थे,हाँ लेकिन उनके बारे में कोई नही जानता था।६-७ साल के प्यार को कोई कैसे इस तरह व्यर्थ जाने दे ये सोचते ही किशोर को तो मानो खलबली उठती थी।इधर रेणुका का भी यही हाल था और वो तो किसी को कह भी नही सकती थी क्योंकि उसके पिताजी से तो गाँव के लोग भी डरते थे तो वो क्या चीज थी अगर किसी से कहूँगी तो बात धीरे-धीरे फैलते हुए तो जरूर मेरे पिताजी को पता चलेगी,आखिर उसने फैसला किया कि मैं किसी से कुछ नही कहूँगी।अब रेणुका की भी उम्मीद किशोर पर ही टिकी हुई थी।
                  अगले दिन किशोर अपनी दीदी को लेकर उसके गाँव गया, जाते ही उसने रेणुका को ढूँढा पर वो उसे मिली नही।वो तो बाज़ार गयी है ऐसा उसकी माँ ने किशोर से कहा।किशोर चाहता तो वह ये बात सभी को बता सकता था कि वह रेणुका से प्यार करता है पर उसने बिना रेणुका से पूछे यह कहना ठीक नही समझा।आखिर उसने रेणुका का शाम तक इंतज़ार किया पर वह बाज़ार से नही लौटी थी।किशोर उस दिन अपनी बहन के पास ही रुक गया पर उसकी किश्मत ऐसी थी कि रात में उसे पता चला कि रेणुका तो बाज़ार से हीं अपने दीदी के यहाँ चली गयी।किशोर को काफी दुख हुआ।किशोर अगले दिन दीदी के यहाँ से आ गया।
             कुछ दिनों के बाद किशोर फिर आया उस दिन रेणुका से उसकी भेंट तो हुई लेकिन रेणुका को पता नहीं था कि किशोर यहाँ आया था उसकी गैरमौजूदगी में।रेणुका तो किशोर को देखते ही आग-बबूला हो गयी थी उसने किशोर की एक ना सुनी किशोर ने उसे बहुत समझाने की कोशिश की लेकिन रेणुका पर कोई असर नहीं।उसे लगा कि किशोर यहाँ आया ही नहीं किसी से बात करने।किसी को पता भी तो नहीं था उनके प्यार के बारे में जो उन्हें यह बताता कि किशोर यहाँ आया हुआ था।वह बहुत देर तक उससे यही कहता रहा कि मैं यहाँ आया था तुमसे मिलने लेकिन रेणुका ने उसकी बातों को मानो अनसुनी कर दी तो फिर किशोर वहाँ से आ गया।किशोर ने ये बात रेणुका की भाभी को बताई पर उसे क्या पता था कि वो ऐसी है।उसने रेणुका के कान भरे और जितना उनके दिलों में प्यार था उतनी ही नफ़रत फैला दी।यहाँ किशोर इन बातों से अनजान था और पल-पल उसी के बारे में सोचता था।ना तो उसे रात को नींद आती ना ही दिन को चैन मिलता।उसे ऐसा लग रहा था कि सुकून तो उसकी किश्मत में ही नहीं लिखा हुआ है।
           एक महीने हो चले थे किशोर को अपनी छुट्टी पर आए उसे तो पता ही नहीं चला कि कैसे एक महीने बीत गए उसने अपनी माँ को कहा माँ मुझे अब जाना होगा , माँ ने ये बात सुनते ही रोना शुरू कर दिया आखिर तू आया लेकिन कैसे दिन बीत गए पता ही नहीं चला।माँ को रोता देख किशोर के आँखों से भी आँसू आने लगे।उसी रात किशोर को जाना जो था।
               अगले दिन किशोर ने अपना सामान बाँधा और भारी मन से विदा हुआ।पूरे रास्ते उसने यही सोचा कि उसने एक बार भी इस बात को लेकर किसी से कोई खास बातचीत नहीं की।उसी का ये प्रभाव है कि उसकी किसी ने मदद नहीं की।आखिर किशोर हिमाचल पहुँचा ड्यूटी लिया फिर भी उसे अपना काम करने में मन नहीं लग रहा था,उसे हमेशा यही लगता था कि वह रेणुका का गुनेहगार है।फिर अगले क्षण वो ये सोचने लग जाता कि मैं तो बात भी करने गया था लेकिन उसने ही मेरी नहीं सुनी तो फिर दूसरा कौन सुनेगा।किशोर को वहाँ भी चैन नहीं था वो अपनी ड्यूटी भी छोड़ नहीं सकता था और काम करने में उसे जी भी नहीं लगता वो एकदम हैरान-परेशान रहने लगा।लेकिन वो भी एक सैनिक था सरहदों को छोड़ कर उसके जीवन में किसी का महत्व इतना ज़्यादा नहीं था कि उसके लिए वह वापस आ जाये।
               कुछ दिनों बाद वह दिन भी आ गया जिस दिन रेणुका की शादी होने वाली थी।यहाँ किशोर को तो उस दिन से सब कुछ दुर्लभ हो गया।हालाँकि एक सैनिक होने के कारण वह कभी भी किसी चीज से हार नहीं मानता था।एक दिन उसने ऐसे ही रेणुका की भाभी को फोन किया और पूछा कि शादी कैसी रही उनका जवाब सुनते ही किशोर एक बार फिर आहत हो गया, भाभी ने बताया कि उसे तो अब ससुराल गए भी दो दिन हो गए।कोई इस दुनियाभर में नहीं है कि वह मुझे कहे कि रेणुका कि शादी नहीं हुई यह किशोर सोचने लगा,पर ऐसा कोन हो कि सच को झूठ साबित करे यह भी उसे पता था।
              लगभग महीने भर बाद  किशोर ने सोचा कि अब तो रेणुका की शादी को महीनाभर हो चला है उस दिन उसने श्रेया दीदी को फोन किया और सबसे बातें की।जब वह अपने भांजे से बात कर रहा था तो उसे पता चला कि शादी की तारीख तो कुछ वजहों से आगे बढ़ गई उस दिन तो शादी हुई ही नहीं।किशोर तो खुशी से पागल हो गया उसने फोन रखा और अपनी यूनिट वाले दोस्तो को अपने प्यार के बारे में बताया कि उसके साथ कैसे ये सब हुआ।रात में उसने दोस्तो को अच्छी खासी पार्टी दी।रात को घर आकर किशोर को एहसास हुआ कि रेणुका की भाभी कितनी शातिर है।उसे बहुत गुस्सा आया पर वह कर भी क्या सकता था।लेकिन वह फिर यह भूल गया क्योंकि इतनी खुशी जो मिली थी।
               एक सुबह फोन आया घर से कि, माँ बहुत बीमार है किशोर ने छुट्टी ली और ट्रेन पकड़ ली २ दिनों में तो यहाँ माँ की कुछ ज़्यादा ही तबियत बिगड़ गई थी।किशोर वहाँ दो दिन में पहुँचा,पहुँचते ही माँ की सेवा में लग गया।उसने माँ की बहुत सेवा की २-४ दिनों में माँ की हालत सुधरी तो श्रेया ने उससे कहा कि किशोर अब माँ ठीक हो गई है तो कल तुम मुझे गाँव पहुँचा देना किशोर तो मन ही मन बहुत ज्यादा खुश हुआ था कि वह अब रेणुका से मिलेगा ३ महीने हो गए उससे मिले हुए और अब वह कल मिलेगी।अबकीबार तो उसका गुस्सा भी शांत हो गया होगा हमलोग आपस में बैठ ढेरों बातें करेंगे।पिछली बार तो उसकी शादी होने वाली थी इसलिए वह परेशान थी इस बार वो बात भी करेगी और २-३ महीने बाद हम दोनों शादी कर लेंगे उसके पिताजी और भैया सभी से बात करूँगा।लेकिन एक बार तो कम से कम दीदी को रुकने के लिए कहता हूँ ये सोचते ही किशोर ने कहा दीदी तुम तो तब आयी जब माँ बीमार थी मैं तो बाद में पहुँचा तुमने माँ की काफी सेवा की है एक-दो दिन और रुक जाओ अभी माँ ठीक ही हुई है।किशोर ने दीदी से कह तो दिया पर वह इसका जवाब दीदी से ना में चाह रहा था क्योंकि वह भी तो रेणुका से मिलने को तरस रहा था।वही हुआ जो वह चाहता था दीदी ने कहा कि नहीं कल ही चलना है। लेकिन किशोर ने ज़िद की कि नहीं कल नही २-३ दिन के बाद पर दीदी ने कहा कि अगर कोई काम नहीं होता तो मैं रुक जाती पर क्या कहूँ वो जो रेणुका की शादी लगभग ३ महीने पहले होने वाली थी वो नहीं हुई समय आगे बढ़ाया गया था तो उसकी शादी परसों होने वाली है तू बस कल मुझे छोड़ दे गाँव। दीदी की इस बात ने फिर से किशोर को एक बार झकझोर दिया।
                अगले सुबह किशोर श्रेया दीदी को छोड़ने नहीं जाना चाहता था पर क्या करता उसे जाना ही पड़ा।वहाँ जाने के बाद वह रेणुका से मिला और कहा कि यदि तुम उस दिन मेरी बात समझती तो आज हमारी शादी तय रहती और कल हमारी शादी होती।रेणुका ने किशोर से कहा मुझे माफ़ कर दो किशोर मुझे नहीं पता था कि तुम यहाँ आये थे,और मैं हीं नहीं थी मुझे माफ़ कर दो।किशोर ने कहा अब माफ़ी मांगने से कुछ नहीं होगा कल तुम्हारी शादी है बेहतर यही होगा तुम भूल जाओ मुझे।रेणुका ने पूछा क्या तुम भी भुला पाओगे मुझे? किशोर कुछ नहीं बोला रेणुका ने फिर यही पूछा किशोर ने कुछ भी जवाब नहीं दी और आ गया।
                रेणुका के पिताजी ने उससे कहा कि कल रेणुका की शादी है आप आये हैं तो रहिएगा शादी के बाद ही जाइयेगा।उसने कहा चाचाजी छोड़ दीजिये मुझे, मैं नहीं रह पाउँगा माँ की तबियत खराब है मैं नहीं रुक पाउँगा।किशोर दीदी के यहाँ से आ गया अंतिम बार रेणुका से मिलकर।वह उन लम्हों को भूल जाना चाहता था लेकिन भुला नहीं पाता था।इधर रेणुका की भी शादी हो गई।
……….  ... ... ... …………….जारी है।
- रंजन कश्यप
नोट-इस कहानी का किसी भी वास्तविक जीवन से कोई सम्बन्ध नहीं है यह सब महज़ एक कल्पना पर आधारित है। किसी भी वास्तविक जीवन से संबंध एक संयोगमात्र है।

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