Monday, December 24, 2018

जूड़ शीतल

      झा जी सिन्दरी,बिहार (वर्तमान झारखंड तत्कालीन बिहार) में एक टा खाद के कारखाना में मुंसी के काज करैत रहैथ। बहुत कर्मठ लोक छलैथ झा जी, आ कारखाना में हुनका एगो निम्नवर्गीय कर्मचारी सफाई वला सँ ल क मैनेजर तक सबसँ बहुत बढियाँ सम्बन्ध छलैन। कारखाना के मनेजर ओहि समय में बेगूसराय के एक टा ठाकुर जी रहथि दूनू गोटे मैथिल रहथि तँ हुनका दुनू के किछु जादा दोस्ती छलनि। झा जी कर्मठ लोक छलाह तैं हिनका ठाकुर जी बेसी मानथीन। दुनू गोटे के परिवार में सेहो किछु जादे दोस्ती छलैन।
             १० बरख पहिने एक टा एक्सीडेंट में झा जी के बेटा, पुतौह आ पोता के मृत्यु भ गेल छलनि। झा जी के कनियाँ आ एक टा पोती छलनि जे कि गाँव (मधुबनी) में रहैत छलथिन। झा जी महीना में दू-तीन दिन के लगातार छुट्टी भेला पर सेहो गाँव आइब जाइत छलाह। पोती लेल किछु उपहार लैये क अबैत छलाह चाहे कतबो कम दिन गेला किया नै भेल हो। ठाकुर जी के हिनका घर के बारे में सब किछु पता छलैन त उ सेहो हिनकर दरमाहा  दै में देरी नै करथिन अगर कोनो कारण स देर भ जायत छल त उ अपन घर स दैत छलाह फेर बाद में मिलला पर उ राइख लैत छलाह। कियाकि ठाकुर जी त बुझैत छलाह जे कि हिनक परिवार में बस इहै एक टा कमौआ छैथ। १० साल पहिले जखन हिनक बेटा के एक्सीडेंट भ गेल छलैन तहन हिनकर पोती मात्र डेढ़ साल के रहैन मुदा दुनू प्राणी मिल क आब ओकरा पालि पोसि क नमहर केलैन। आब त उ बच्चा तेसर क्लास के विद्यार्थी भ गेलैक।
        झा जी के पोती के बड़ चिंता छलैन कियाकि त ओकर पढ़ाई-लिखाई आ बियाह तक के चिंता केनिहार एगो झा जी त छलाह। अप्पन दरमाहा में उ जे किछु खेनाइ आर रहनाइ में खर्च करैत रहैथ ओकर अलावा सब पाई के उ हिसाब स खर्च करैत छलाह। झा जी पुरना समय के इंटर पास छलैथ त इ छुट्टी के बाद कारखाना के कर्मचारी सबहक धीया-पूता सब के पढ़ा दैत छलैथ। जे कर्मचारी सबहक घर दूर छलैक उ अप्पन परिवार समेत सिन्दरी में रहैत छलैक। उ कारखाना स बाहर के किछु बच्चा के सेहो पढ़बैत छलाह ओहि स जे किछु आमदनी भ जैन ओहि पाई के उ पोती के स्कूल और ट्यूशन फीस में खर्च करैत रहैथ। कारखाना में झा जी के ग्रामीण एगो सुनील झा जी के परिवार रहैत छल। झा जी हुनक बच्चा के सेहो पढ़ा दैत रहथिन, हुनक पत्नी हिनका खाना नै बनाबँ दैत रहथिन, त ई हुनके लग खाइत रहैथ। झा जी सेहो हुनक बच्चा के पढ़बै के फीस नै लैत छलाह।
             एक बेर झा जी के कारखाना में टाङ में चोट लाईग गेल रहनि त भरि दिन हिनक डेरा पर एनिहार-गेनिहार के कमी नहिं छल। सुनील झा के परिवार हिनक खूब मोन सँ सेवा केलनि। हिनक ४-५ दिन में टाङ ठीक भ गेलैक त ई कारखाना जेनाई शुरु क देलनि। कारखाना में हिनका देखि क ठाकुर जी आगि भ गेलाह।
ठाकुरजी-आँहाँ किया एलौं एहन स्थिति में यौ?
झा जी- आब हम ठीक छी पूरा, देखू हैयै (झा जी चैल क देखा देलखिन)।
ठाकुरजी- तैयो!
झा जी- अरे छोड़ू न।
ठाकुरजी- हम त एखनो कहब जे नैहे आबू, मुदा आँहाँक जे इच्छा।
झा जी - आब हम ठीक छी, हम ऐबे करब मुफ्त के दरमाहा हम नईं लेब।
ठाकुर जी- आँहाँ के जे इच्छा।
           होली के समय आइब गेल छल ओहि में झा जी गाम नै जाइत छलैथ कियाकि त होली स दू-तीन दिन पहिने हुनक घर मे १० बरष पहिने हादसा भेल छल, से होली आबैत याद पड़ि जैन। मुदा एहि साल होली सँ दस दिन पहिने ठाकुर जी के ट्रांसफर हरियाणा भ गेलैक, सब गोटे हुनका विदाई केलैन। ठाकुर जी हरियाणा चैल गेलाह। कारखाना में ठाकुर जी के जगह पर हरियाणा के मैनेजर आइब गेल छल। नबका मैनेजर के केकरो स बनिते नहिं छल। बात-बात पर  बेमतलब के मजदूर सब के डाँटि दैत छलैक। झा जी बहुत समझेलनि जे सर ई सब मजदूर को बेमतलब नईं डाँटिए मुदा हुनका पर कोनो प्रभाव नहिं, उ कहै जे आप सजेशन मत दीजिए आप मुंसी है हमारे बॉस नहीं। झा जी चुप भ जाइत छलैथ।
            झा जी के आब मोन नै लगैत छलैन हरदम सोचैथ जे नोकरी छोड़ि देब मुदा पोती के याद आबि जैन कि यदि हम नै कमेबै त फेर ओकर पढ़ाई लिखाई शादी बियाह के की हेतै। एक महीना भेल कि जूड़ शीतल के समय आइब गेल। दू दिन पहिने हिनका पोती के चिठ्ठी भेटल जाहि में हुनका कहल गेल छल  जे बाबा जूड़ शीतल में आँहाँ आइब जाऊ और हमर चौथा वर्ग के लेल किताब-कॉपी सेहो कीन देब। झा जी कहलखिन जे ठीक छै हम जूड़ शीतल में आइब जैब। झा जी ओहि दिन काम पर गेलाह शाम में काम खत्म करवा के बाद ओ मैनेजेर लग पहुँचला।
झा जी- सर हमको दू दिन के छुट्टी चाहिए।
मैनेजर- क्यो? क्या बात है?
झा जी- सर कल जूड़ शीतल है तो आज रात में हम गाड़ी पकड़ेंगे घर जाने के लेल। आर परसू हम अपना पोती के नया किलास के कॉपी-किताब कीनेंगें अगला दिन हम काम पर आ जाएँगें।
मैनेजर- अरे झा जी ये जूड़ शीतल क्या है? इसका तो यहाँ कोई छुट्टी नहीं है।
झा जी- जी सर जूड़ शीतल के कोनो छुट्टी नै है लेकिन इ हमलोग का पर्व होता है।
मैनेजर- नहीं, हम आपको छुट्टी नहीं दे सकते है।
झा जी- पर सर किताब-कॉपी पोती का…..।
मैनेजर- पर वर कुछ नहीं आपको कल आना है काम पर।
            झा जी दुःखी मोन स आइब गेलाह डेरा पर सीधे आइब क सूति रहला। कनी देर में सुनील झा के पत्नी हिनक खाना ल क आइब गेलथिन।
कनियाँ- कक्का गाम नै जेबाक छैन कि?
झा जी- नै कनियाँ।
कनियाँ- किया यौ?
झा जी- छुट्टी नै देलक।
कनियाँ- पर छोटी के किताब-कॉपी…..?
झा जी- पता नै हम त होली में कहियो नै जाइत छलौं पर जूड़ शीतल में दस दिन के छुट्टी ल क जाइत छलहुँ त गहूम कटा क दौनी करवा क अबैत रही। एहि बेर टाङ में चोट लाईग गेल त छुट्टी केने रहियै ४-५ दिन त सोचलियै जे दू दिन में वापस आइब जेबै। जोन के लगा देबैक खेत में आ छोटी के दादी के सब किछु समझा क, मुदा आब त छुट्टी नै भेल। एखन ठाकुर जी रहिता त हम दस दिन कहितौ त बीस दिन के दैतैथ मुदा आब त उ….।
कनियाँ- छोड़ौथ न हुनकर बात उ त सब के मानैत छलथिन, पर इ मनेजरा सनकल अइछ।
झा जी- हाँ आब देखथुन कि होई छैक।
            झा जी राईत में खाना नै खेलनि। लेकिन भोर में धाञ-धाञ उठि क तैयार भेलाह आ सोचलनि जे भ सकैत यै जे काइल मैनेजर के मूड खराब रहैक त छुट्टी नै देलकैक त कि भ गेलैक जूड़ शीतल त भ गेलै मुदा छोटी के त किताब-कॉपी कीन देबै। झा जी तैयार भ काम पर चैल देलाह। रस्ता में एक टा कार हिनका आगू स निकलल त रोड पर बला किछु कादो हिनका परि गेलैन इ बिसैर गेलाह जे कहाँ छी, ओत्तै इ एक मुट्ठी कादो हाथ मे लेलाह जैं कि गाड़ी रुकल इ फेंकवा के प्रयास में तैयार भ गेलाह। मुदा जहन गाड़ी स एगो महिला निकलल त इ ठमकि गेलाह। हिनका याद एलैन जे हम गाम पर नै छी आर एत्तँ जूड़ शीतल नै छैक। महिला निकलि क हिनका सॉरी कहलैनि तँ इहो कहि देलखिन कोनो बात नै छैक तहने गाड़ी के दोसर गेट खुजलै आ एगो आदमी बाहर निकलल त झा जी देखिते रहि गेलाह उ आओर केओ नै हिनके मैनेजर छलैक आ ओ महिला हुनक पत्नी छलीह। मैनेजर हिनका देख क तुरंत बूझि गेलैक जे ई हमर पत्नी पर कादो मारवा चाहै छलैक। उ नै किछु बाजल आ चुपचाप गाड़ी में बैस क चैल गेल।
           झा जी सेहो बुझि गेलाह जे आब छुट्टी त नहिं मिलत मुदा तैयो पहुँचि क ओ एक बेर मनेजर के कहलनि।
झा जी- सर जी कल तो छुट्टी नहीं दिए आजो दीजियेगा त हम चल जाएँगे।
मैनेजर- आपको बहुत छुट्टी का जरूरत है आप नोकरी छोड़ दीजिये और खूब छुट्टी कीजियेगा खूब जूड़ शीतल मनाइयेगा।
झा जी- वैसे भी पहले परिवार तब न नोकरी। जूड़ शीतल तो हम मनाएँगे हीं।
मनेजर- चले जाइए खूब मनाइए जूड़ शीतल।
          झा जी कारखाना स निकलि डेरा गेलाह जे किछु समान छलैक डेरा में से सब ल क चैल देलाह सुनील झा के कनियाँ के कहलनि जे।
झा जी- कनियाँ हम गाम पर जाइत छियैन।
कनियाँ- छुट्टी भेट गेलैन कि?
झा जी- हमेशा के लेल हम नोकरी छोड़ि देलौं।
              एत्ते कहैत झा जी जल्दी सँ स्टेशन चैल देलाह ट्रेन पकड़ि क गाम पर आइब गेलाह। प्रात भेने सबसँ पहिने उ पोती के किताब-कॉपी कीन देलखिन। आ गहूम के कटनी-दौनी में लाईग गेलाह। जखन हिनका एला दस दिन स बेसी भ गेलैन त हिनकर पत्नी पुछलैन।
पत्नी- काम पर नै जेबै कि?
झा जी- नै।
पत्नी- किया यौ?
झा जी- छोड़ि देलियै।
पत्नी- त आब की करबै?
झा जी- एत्ते किछ करबै।
पत्नी- केहन नीक छलै जे आँहाँ ओत्तै छलौं, आब  एत्तँ बुड़हारी में कि करबै?
झा जी- किछु नै हेतै त अप्पन जेते खेत छै ओहि में खेती क देबै तैयो हमरा सब के गुजर भ जेतैक।
पत्नी- अच्छा हमहूँ देखै छी जे आँहाँ की करबै?
झा जी- बस आँहाँ देखैत जैयो। हम कि करैत छी।
           झा जी अप्पन सब खेत मे खूब मेहनत सँ खेती केनाई शुरू केला हिनका एहि बेर जेत्ते गहूम भेलैन सब के बेच क इ सिन्दरी गेलाह आर सब पाई के खाद कीन लेलैथ। हिनका एला के बाद ओत्त के मुंसी सुनील झा भ गेल रहथिन। सुनील झा हिनका थोक भाव पर खाद दिया देलनि। इ आइब क गाम पर एक टा खाद-बीज के दोकान खोललैन सबसँ पहिले इ अप्पन खेत में दैथिन तहन बेचैत रहैथ। अगल बगल के गाँव में सेहो एहन कुनो दोकान नै रहै त हिनकर दोकान खूब चलँ लगलैक। इ सस्ता में बढ़ियाँ समान बेचै छलाह त खूब कमाई होवँ लगलैक।
            समय धाञ-धाञ बीतलै, झा जी पूरा क्षेत्र में सबसँ जादा खाद-बीज बेचि क रेकॉर्ड बनेला। हिनका ओत्त कारखाना वाला मनेजर प्रोग्राम रखवा के लेल निमंत्रण देलकैक। झा जी तैयार भ गेलखिन। आब त झा जी एक बेर में २०-२५ ट्रक क खाद-बीज लेवँ लगला लगभग १०० लेबर रखने रहथि। १० साल में झा जी बहुत आगू बढ़ि गेलैन। पूरा क्षेत्र में झा जी के चर्चा छलैक।
              उ दिन आइब गेलै जहिया झा जी के ओहि ठाम प्रोग्राम होयतैक। मंच सब तैयार भेल छल बहुत मीडिया वाला सब एल छल। खूब प्रसन्नता के माहौल छलैक। झा जी मंच पर सबहक इंतेज़ार में बैसल छलाह २-३ मिनट के बाद उ कंपनी के अधिकारी सब के गाड़ी एनाई शुरू भ गेल। ओहि में स एक टा गाड़ी सँ ठाकुर जी निकलला, झा जी चीन्ह गेलखिन ठाकुर जी के आ ठाकुर जी सेहो चिन्हलैन दुनू गोटे भेंट केला गला मीलि क ठाकुर जी कहैत छथिन।
ठाकुर जी- की हाल चाल छै यौ?
झा जी- बहुत बढ़िया अप्पन कहियौ.
ठाकुर जी- अप्पनो बढ़ियाँ छैक। ओत्तँ स चैल एलियै हम बदली के दू महीना बाद आएल छलहुँ मुदा सुनील जी कहलनि जे आब ओ गाम पर रहैत छैथ एत्तँ काम छोड़ल हुनका १ महीना भ गेल।
झा जी- आँहाँ गेलियै उहै महीना हम काम छोइर देलौं।
ठाकुर जी- किया नबका मनेजर ठीक नै रहैथ कि?
झा जी- नै बहुत नीक छलैथ हमही नै काज करब में सकैत छलहुँ।
ठाकुर जी- चलू कोनो बात नै छै काज छोरलौ त न आई एत्ते बड़का गोदाम अइछ एत्ते मजदूर अइछ। ओत्तँ काज करैत रहि आओर एत्तँ करवाबैत छी बढ़िया यै न।
झा जी- हाँ एत्तँ कम स कम घर के चिंता त नै अइछ।
          बाते बात में पाछा स आवाज एलैक हेलो सर बहुत बहुत बधाई आओर एक टा गुलदस्ता वला आदमी झा जी के गुलदस्ता देलखिन झा जी गुलदस्ता लैत धन्यवाद कहलनि। ओ आदमी मुँह ताकैत रहि गेल आ झा जी सेहो। दुनू गोटे एक दोसर के चीन्ह गेलैन, लेकिन किछु बाजिता ओहि स पहिने कार्यक्रम शुरू भ गेल। उ आदमी और केऊ नै उहै मनेजर छलैक जे हिनका जूड़ शीतलक छुट्टी देने रहैक। उ जूड़ शीतलक छुट्टी झा जी एखनों धरि नहिं बिसरल छलाह।
             कार्यक्रम शुरू भेलैक सब गोटे झा जी के खूब प्रसंसा केलनि जे मात्र ५ साल में इ एत्ते आगा बढ़ला आओर १० साल में हिनक केऊ हाथ पकड़नाहर नहिं छैन। कंपनी के अधिकारी सब सेहो प्रसन्न छलैथ सब झा जी और हुनक परिवार लेल उपहार सब अनने रहथि। सब किछु भेला के बाद प्रेस वला सब सवाल पूछनाई शुरू केलकैन।
प्रेस- झा जी आप पहले एक मुंसी थे कंपनी में आज आपका चर्चा कंपनी में चल रहा है शुरू में तो आपको दिक्कत आयी होगी?
झा जी- जब हमने इस दुकान की शुरूआत की थी तब भी और आज भी हम खेती कर रहें हैं हम एक भी खाद या बीज बिना उपयोग के नहीं बेचते और दाम भी सुविधाजनक रखते है इसी लिए हमको कोई परेशानी नहीं हुई।
प्रेस- आप मुंसी से इतने बड़े विक्रेता कैसे बने?
झा जी- ये एक बड़ी सी कहानी है।
प्रेस- क्या हम जान सकते हैं कि आपके इतने बड़े विक्रेता बनने में किन सबका योगदान रहा?
झा जी- जी बिल्कुल।
प्रेस- तो बताइए..
झा जी- इसमें सबसे बड़ा योगदान हमारे उस समय कारखाने के मैनेजर का था अगर वो उस समय जूड़ शीतल की छुट्टी न देते तो शायद आज हम इतने बड़े विक्रेता नहीं होते।
              बस सब बैसल लोक ताली बजेनाई शुरू केलखिन। मनेजर जे छलैथ हुनका आँखि स नोर चूवँ लागल आ झा जी के सेहो। मनेजर आइब कँ झा जी स गला मिल माँफी माँगँ लागल झाजी बाजि उठला जे माँफी आप नहीं माँगिये बल्कि हम आपको धन्यवाद करते है। कि यदि आप मुझे जूड़ शीतल का छुट्टी न देते तो शायद हम आज भी वहीँ मुंसी होते और मेरा इतना नाम न होता। सब लोक सब हुनका दुनू गोटे के देखैत रहि गेल।
                                            - रंजन  कश्यप
नोट- इ कहानी के कोनो भी वास्तविक जिनगी स कोनो संबंध नै अइछ इ सब मात्र एक टा सोच पर आधारित अइछ। वास्तविक जिनगी स संबंध एकटा संजोगे स भ सकैत अइछ।
                                         
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Sunday, November 11, 2018

अधूरा प्यार-II

     
इसी कहानी के पहले भाग को पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें धन्यवाद🙏
  कृपया पहले भाग को पढ़ने के बाद भाग-II पढ़े     
अब आगे पढ़ें-

रेणुका की शादी हो गई और वह ससुराल आ गयी वहाँ भी उसे किशोर की बहुत याद आ रही थी। इधर किशोर का भी हाल बेहाल था उसे तो कोई सम्हालने वाला भी नहीं था पल पल सोचता रहता कि रेणुका से मेरी शादी क्यो नही हुई। अक्सर जब हमारा बुरा वक्त चलता रहता है तब हमसे कुछ गलतियां हो जाती है वही किशोर के साथ भी हो गयी। माँ की तबियत फिर से बिगड़ने लगी थी उसने श्रेया दीदी को फ़ोन किया और दोनों माँ को लेकर शहर के बड़े अस्पताल चले गए। डॉक्टर ने किशोर की माँ को देखा उन्हें लग रहा था कि ये किसी बहुत बड़ी बीमारी की शिकार हैं। डॉक्टरों ने मीटिंग बुलाई और फौरन ही ऑपरेशन करने का निर्णय लिया। ऑपरेशन तो उनका किया ही पर वो बच नहीं पाई। उनके शरीर का अंतिम संस्कार किया गया सब बहुत दुःखी थे पर कर भी क्या सकते थे।
               लगभग १०-१५ दिन हो गए थे माताजी के संस्कार को सब अपने अपने घर चले गए। किशोर के पिताजी बचपन में ही चल बसे थे तब से उसके पिता और माता दोनों उसकी माँ ही थी और वो भी चल बसी तब उसे कोई सम्हालने वाला भी नहीं था। श्रेया दीदी भी चली गई अपने गाँव। अकेलापन किशोर को काटना मुश्किल सा था। इसी अकेलापन में उससे एक गलती हो गई। घर के पास की एक लड़की थी वह किशोर से बचपन से ही बहुत प्यार करती थी हालाँकि किशोर ने कभी उसपर ध्यान नहीं दिया था और उसे तो पता भी नहीं था। एक दिन वो लड़की किशोर के पास आई और अपने प्यार का इज़हार किया। किशोर ने उससे कहा मैं किसी और से प्यार करता था और उससे मैं शादी भी करना चाहता था तो मैं तुम्हे कभी अपना पहला प्यार नहीं बनाऊँगा। लड़की किशोर से बहुत प्यार करती थी और उसे उसका अकेलापन भी नहीं देखा जा रहा था तो उसने हामी भर दी कह दिया कि मुझे कोई एतराज नहीं है। मैं तुम्हारा दूसरा प्यार ही बन कर रह लूँगी।
             किशोर वापस हिमाचल आ गया अपना ड्यूटी शुरू किया वहीं से वह कुसुम से बातें करता लेकिन वह रेणुका को नहीं भुला पा रहा था। इधर रेणुका के शादी को भी ३-४ महीने हो गए पर वो इतने दिनों में मुस्करायी भी नहीं। एक दिन उसके पति ने पूछा कि तुम हर वक्त हमेशा उदास रहती हो इसका कारण क्या है तो उसने अपने पति को सारी कहानी बता दी उसके पति बहुत अच्छे आदमी थे उन्होंने पूछा तुमने मुझसे पहले क्यो नहीं कहा कि तुम किसी और से प्यार करती हो मुझे पता रहता तो मैं पहले तुम्हे उसके पास पहुँचा आता। तुम आज ५ महीने बाद कह रही हो एक तो तुम उदास हो और वो भी तो बेहाल ही होगा।
           रेणुका के पति ने किशोर से बात की और पूछा कि किशोर गाँव कब आ रहे हो जवाब मिला कि १० दिन बाद नये साल की छुट्टी में।तो उसने ही एक युक्ति निकाली कि आओ हम  कहीं मिलते हैं और वहां आराम से बात करेंगे। दोनों की बातचीत हो गई दोनों मिलने को तैयार हो गए। किशोर सोच रहा था कि कहीं इसे मेरे और रेणुका के प्यार के बारे में पता तो नहीं चल गया इसीलिए बिना कुछ कहे मिलने को कह रहा है कहीं यह बदला लेने की तो नहीं सोच रहा है।
            ३० दिसंबर, साल के अंतिम दिन से एक दिन पहले फिर उन दोनों की बात हुई कि परसों हम अपने-अपने घर चले जाएँगे तो कल हम वाराणसी में ही मिलेंगें किशोर तैयार हो गया वाराणसी में मिलने के लिए। किशोर के मन में तरह-तरह की बातें उठ रही थी कि ये मुझे अकेले बुला रहा है तो या तो ये मेरे और रेणुका के बीच जो कुछ भी था उसको लेकर कुछ जानकारी चाहता होगा या फिर मैं जो रेणुका से बेइंतेहा प्यार करता था और हमारी शादी नहीं हुई उसे लेकर यह मुझे चिढ़ाएगा कि हमारा प्यार सच्चा नहीं था जो हमारी शादी नहीं हो सकी। तो कहीं ये रेणुका को साथ में लाए और मेरे और रेणुका के ऊपर तरह-तरह के कटाक्ष करे, ऐसे ही तरह-तरह के ख्याल किशोर को आ रहे थे। तो उसने कुसुम को फोन किया और कहा कि तुम कल वाराणसी आ जाओ मैं घर आ रहा हूँ। तुम मुझे लेने आ जाओ कल,कुसुम आने को तैयार हो गई पर किशोर ने उसे ये नहीं बताया कि वहाँ पर वो लोग भी आ रहे हैं।
             रेणुका ने अपने पति से पूछा कि आप कहाँ जा रहे हैं तो उसने हँसकर जवाब दिया कि मैं नहीं, हम जा रहे हैं।रेणुका ने कहा पर कहाँ तो उसने कहा कि वाराणसी। फिर रेणुका ने पूछा क्यों तो उसने बताया कि यह एक सरप्राइज है। फिर दोनों तैयार हो वाराणसी के लिए रवाना हो गए। इधर किशोर हिमाचल से और कुसुम अपने घर से वाराणसी के लिए चले।
              अगले सुबह सबसे पहले रेणुका और उसके पति वाराणसी पहुँचे। वे दोनों पास ही के होटल में जाकर रूके। थोड़ी देर बाद किशोर के आने का समय हो चला तो उसने रेणुका से कहा तुम यहीं रूको मैं तुम्हारा सरप्राइज लेकर आता हूँ रेणुका ने कहा ठीक है तो वो वहाँ से स्टेशन की ओर चल पड़ा।
                  कुछ देर बाद वहाँ किशोर स्टेशन पहुँचा और ट्रेन से उतर वह रेणुका के पति के साथ होटल की तरफ चल पड़ा। रास्ते में उसे पता चला कि होटल में मेरे लिए एक सरप्राइज है वह खुश हो गया। कुछ समय बाद दोनों होटल के पास आए तब उसने किशोर से कहा कि तुम यहाँ बाहर ही रुको मैं आता हूँ। किशोर वहीं सड़क के दूसरी ओर खड़ा रहा और वो होटल के अंदर गया और कुछ देर बाद एक महिला के साथ बाहर निकला किशोर जहाँ खड़ा था वहाँ से वो महिला साफ-साफ नहीं दिख रही थी कि वह कौन है।
                  कुछ समय बाद जब रेणुका और उसके पति होटल के बाहर निकल कर आये तब वे दोनों किशोर को बिल्कुल साफ दिखाई देने लगे। किशोर ने बहुत दिनों के बाद रेणुका को देखा था तो दोनों एक-दूसरे को बस देखे जा रहे थे। वे सब कुछ भूल चुके थे, यह भी भूल गए थे कि रेणुका की शादी हो गई थी बस एक-दूसरे को देखे जा रहे थे। फिर अचानक दोनों का ध्यान एक-दूसरे से हटा तो रेणुका अपने पति के तरफ देखने लगी। उसने रेणुका से कहा कि तुम देख क्या रही हो जाओ किशोर के पास आज से तुम मेरी नहीं किशोर की ही अमानत हो, अगर मुझसे कोई गलती हो गई हो तो मुझे माफ कर देना। इतना कहते हीं तीनों के आँखों में आँसू आ गए। रेणुका, किशोर की तरफ ऐसे दौड़ी कि जैसे कोई छोटा सा बच्चा किसी मनपसंद खिलौने के लिए दौड़ता है दोनों ने एक-दूसरे को गले लगा लिया और खुशी से जोर-जोर से रोने लगे। तभी उस सड़क पर न जाने कहाँ से एक तेज रफ्तार से गाड़ी आई और उन दोनों को टक्कर मारती चली गई। लोगों ने उसका पीछा करना शुरू तो किया पर वो भाग खड़ा हुआ।
              रेणुका और किशोर दोनों एक-दूसरे के बाँहों में बिना किसी देरी के स्वर्ग सिधार गए। सच्चे प्रेमी को भगवान ने मिलवा दिया, दोनों यदि जीवित रहते तो शायद पूरी दुनिया का ताना-बाना सुनना पड़ता पर भगवान ने उन्हें निश्चिंत कर दिया। रेणुका के पति वहाँ जोर-जोर से चित्कारते रहे और अपने ऊपर पचताते रहे कि बेकार हीं मैंने ये योजना बनाई मैं यदि ये योजना न बनाता तो शायद दोनों एक-दूसरे से दूर हीं सही पर जीवित होते। लोगों का कहना था कि इसमें आपकी कोई गलती नहीं भगवान को शायद यही मंजूर था।
                लोगों के नजरिए में उनका प्यार अधूरा ही था पर उनका प्यार पूरा हो चुका था हाँ लेकिन उनके प्यार का एक हैप्पी ऐंडिंग नहीं हो सका। उन्होंने तो पूरी जिंदगी प्यार का इंतजार हीं किया था इसी के लिए कितने ही दुखों को झेला, पर फिर से वही गौतम बुद्ध की बात याद आ गई कि इस दुनिया में सुखी कौन है?

                                          -रंजन कश्यप

 नोट-इस कहानी का किसी भी वास्तविक जीवन से कोई सम्बन्ध नहीं है यह सब महज़ एक कल्पना पर आधारित है। किसी भी वास्तविक जीवन से संबंध एक संयोगमात्र है।
धन्यवाद🙏

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Monday, September 17, 2018

अधूरा प्यार


चानक उसे पता चला कि जिससे मैं प्यार करता हूँ उसकी तो शादी हो रही है।यह ख़बर सुनते ही किशोर पूरी तरह से टूट गया था।हालाँकि किशोर ने ये बातें अपने भांजे से सुनी थी उसे विश्वास तो नहीं हो रहा था लेकिन उसे अपने भांजे को देखकर ये भी यकीन था कि यह झूठ नही बोलेगा,क्योकि इतना छोटा बच्चा झूठ नही बोलता।और फिर इस बच्चे को तो हमारे बारे में कुछ पता भी नहीं है।ये बात सुनने के बाद झट से किशोर ने अपनी बहन श्रेया से पूछा कि दीदी क्या तुम्हारे यहाँ किसी की शादी हो रही है?दीदी ने उसे कहा हाँ।अगले क्षण हीं उसका दूसरा प्रश्न दीदी के सामने था कि किसकी शादी हो रही है।वह जानता तो था ही पर उसे कहीँ से एक उम्मीद की किरण नज़र आ रही थी कि कहीँ दीदी का जबाब उसके बारे में न हो जिससे वो प्यार करता है,परन्तु उसकी उम्मीद की किरण पूरी तरह से दीदी के जबाब के साथ खत्म हो गयी।
              मैं कल अपने दीदी को लेकर उसके गाँव जाऊंगा तो मैं रेणुका से बात करूँगा कहीं बात बन जाये।मैं उसके पिताजी से बात करूँगा उसके भैया से बात करूँगा मैं सबसे बात करूँगा लेकिन उसी से शादी करूँगा आखिर मुझे भी सरकारी नौकरी है उसके पिताजी उसकी शादी मुझसे ही करेंगे ये सब सोचते हुए किशोर को पूरी रात नींद नहीं आयी।किशोर की दीदी की जिस समय शादी हुई थी तब किशोर १४-१५ साल का था और रेणुका १३साल की तब से ही दोनो एक दूसरे से प्यार करते थे,हाँ लेकिन उनके बारे में कोई नही जानता था।६-७ साल के प्यार को कोई कैसे इस तरह व्यर्थ जाने दे ये सोचते ही किशोर को तो मानो खलबली उठती थी।इधर रेणुका का भी यही हाल था और वो तो किसी को कह भी नही सकती थी क्योंकि उसके पिताजी से तो गाँव के लोग भी डरते थे तो वो क्या चीज थी अगर किसी से कहूँगी तो बात धीरे-धीरे फैलते हुए तो जरूर मेरे पिताजी को पता चलेगी,आखिर उसने फैसला किया कि मैं किसी से कुछ नही कहूँगी।अब रेणुका की भी उम्मीद किशोर पर ही टिकी हुई थी।
                  अगले दिन किशोर अपनी दीदी को लेकर उसके गाँव गया, जाते ही उसने रेणुका को ढूँढा पर वो उसे मिली नही।वो तो बाज़ार गयी है ऐसा उसकी माँ ने किशोर से कहा।किशोर चाहता तो वह ये बात सभी को बता सकता था कि वह रेणुका से प्यार करता है पर उसने बिना रेणुका से पूछे यह कहना ठीक नही समझा।आखिर उसने रेणुका का शाम तक इंतज़ार किया पर वह बाज़ार से नही लौटी थी।किशोर उस दिन अपनी बहन के पास ही रुक गया पर उसकी किश्मत ऐसी थी कि रात में उसे पता चला कि रेणुका तो बाज़ार से हीं अपने दीदी के यहाँ चली गयी।किशोर को काफी दुख हुआ।किशोर अगले दिन दीदी के यहाँ से आ गया।
             कुछ दिनों के बाद किशोर फिर आया उस दिन रेणुका से उसकी भेंट तो हुई लेकिन रेणुका को पता नहीं था कि किशोर यहाँ आया था उसकी गैरमौजूदगी में।रेणुका तो किशोर को देखते ही आग-बबूला हो गयी थी उसने किशोर की एक ना सुनी किशोर ने उसे बहुत समझाने की कोशिश की लेकिन रेणुका पर कोई असर नहीं।उसे लगा कि किशोर यहाँ आया ही नहीं किसी से बात करने।किसी को पता भी तो नहीं था उनके प्यार के बारे में जो उन्हें यह बताता कि किशोर यहाँ आया हुआ था।वह बहुत देर तक उससे यही कहता रहा कि मैं यहाँ आया था तुमसे मिलने लेकिन रेणुका ने उसकी बातों को मानो अनसुनी कर दी तो फिर किशोर वहाँ से आ गया।किशोर ने ये बात रेणुका की भाभी को बताई पर उसे क्या पता था कि वो ऐसी है।उसने रेणुका के कान भरे और जितना उनके दिलों में प्यार था उतनी ही नफ़रत फैला दी।यहाँ किशोर इन बातों से अनजान था और पल-पल उसी के बारे में सोचता था।ना तो उसे रात को नींद आती ना ही दिन को चैन मिलता।उसे ऐसा लग रहा था कि सुकून तो उसकी किश्मत में ही नहीं लिखा हुआ है।
           एक महीने हो चले थे किशोर को अपनी छुट्टी पर आए उसे तो पता ही नहीं चला कि कैसे एक महीने बीत गए उसने अपनी माँ को कहा माँ मुझे अब जाना होगा , माँ ने ये बात सुनते ही रोना शुरू कर दिया आखिर तू आया लेकिन कैसे दिन बीत गए पता ही नहीं चला।माँ को रोता देख किशोर के आँखों से भी आँसू आने लगे।उसी रात किशोर को जाना जो था।
               अगले दिन किशोर ने अपना सामान बाँधा और भारी मन से विदा हुआ।पूरे रास्ते उसने यही सोचा कि उसने एक बार भी इस बात को लेकर किसी से कोई खास बातचीत नहीं की।उसी का ये प्रभाव है कि उसकी किसी ने मदद नहीं की।आखिर किशोर हिमाचल पहुँचा ड्यूटी लिया फिर भी उसे अपना काम करने में मन नहीं लग रहा था,उसे हमेशा यही लगता था कि वह रेणुका का गुनेहगार है।फिर अगले क्षण वो ये सोचने लग जाता कि मैं तो बात भी करने गया था लेकिन उसने ही मेरी नहीं सुनी तो फिर दूसरा कौन सुनेगा।किशोर को वहाँ भी चैन नहीं था वो अपनी ड्यूटी भी छोड़ नहीं सकता था और काम करने में उसे जी भी नहीं लगता वो एकदम हैरान-परेशान रहने लगा।लेकिन वो भी एक सैनिक था सरहदों को छोड़ कर उसके जीवन में किसी का महत्व इतना ज़्यादा नहीं था कि उसके लिए वह वापस आ जाये।
               कुछ दिनों बाद वह दिन भी आ गया जिस दिन रेणुका की शादी होने वाली थी।यहाँ किशोर को तो उस दिन से सब कुछ दुर्लभ हो गया।हालाँकि एक सैनिक होने के कारण वह कभी भी किसी चीज से हार नहीं मानता था।एक दिन उसने ऐसे ही रेणुका की भाभी को फोन किया और पूछा कि शादी कैसी रही उनका जवाब सुनते ही किशोर एक बार फिर आहत हो गया, भाभी ने बताया कि उसे तो अब ससुराल गए भी दो दिन हो गए।कोई इस दुनियाभर में नहीं है कि वह मुझे कहे कि रेणुका कि शादी नहीं हुई यह किशोर सोचने लगा,पर ऐसा कोन हो कि सच को झूठ साबित करे यह भी उसे पता था।
              लगभग महीने भर बाद  किशोर ने सोचा कि अब तो रेणुका की शादी को महीनाभर हो चला है उस दिन उसने श्रेया दीदी को फोन किया और सबसे बातें की।जब वह अपने भांजे से बात कर रहा था तो उसे पता चला कि शादी की तारीख तो कुछ वजहों से आगे बढ़ गई उस दिन तो शादी हुई ही नहीं।किशोर तो खुशी से पागल हो गया उसने फोन रखा और अपनी यूनिट वाले दोस्तो को अपने प्यार के बारे में बताया कि उसके साथ कैसे ये सब हुआ।रात में उसने दोस्तो को अच्छी खासी पार्टी दी।रात को घर आकर किशोर को एहसास हुआ कि रेणुका की भाभी कितनी शातिर है।उसे बहुत गुस्सा आया पर वह कर भी क्या सकता था।लेकिन वह फिर यह भूल गया क्योंकि इतनी खुशी जो मिली थी।
               एक सुबह फोन आया घर से कि, माँ बहुत बीमार है किशोर ने छुट्टी ली और ट्रेन पकड़ ली २ दिनों में तो यहाँ माँ की कुछ ज़्यादा ही तबियत बिगड़ गई थी।किशोर वहाँ दो दिन में पहुँचा,पहुँचते ही माँ की सेवा में लग गया।उसने माँ की बहुत सेवा की २-४ दिनों में माँ की हालत सुधरी तो श्रेया ने उससे कहा कि किशोर अब माँ ठीक हो गई है तो कल तुम मुझे गाँव पहुँचा देना किशोर तो मन ही मन बहुत ज्यादा खुश हुआ था कि वह अब रेणुका से मिलेगा ३ महीने हो गए उससे मिले हुए और अब वह कल मिलेगी।अबकीबार तो उसका गुस्सा भी शांत हो गया होगा हमलोग आपस में बैठ ढेरों बातें करेंगे।पिछली बार तो उसकी शादी होने वाली थी इसलिए वह परेशान थी इस बार वो बात भी करेगी और २-३ महीने बाद हम दोनों शादी कर लेंगे उसके पिताजी और भैया सभी से बात करूँगा।लेकिन एक बार तो कम से कम दीदी को रुकने के लिए कहता हूँ ये सोचते ही किशोर ने कहा दीदी तुम तो तब आयी जब माँ बीमार थी मैं तो बाद में पहुँचा तुमने माँ की काफी सेवा की है एक-दो दिन और रुक जाओ अभी माँ ठीक ही हुई है।किशोर ने दीदी से कह तो दिया पर वह इसका जवाब दीदी से ना में चाह रहा था क्योंकि वह भी तो रेणुका से मिलने को तरस रहा था।वही हुआ जो वह चाहता था दीदी ने कहा कि नहीं कल ही चलना है। लेकिन किशोर ने ज़िद की कि नहीं कल नही २-३ दिन के बाद पर दीदी ने कहा कि अगर कोई काम नहीं होता तो मैं रुक जाती पर क्या कहूँ वो जो रेणुका की शादी लगभग ३ महीने पहले होने वाली थी वो नहीं हुई समय आगे बढ़ाया गया था तो उसकी शादी परसों होने वाली है तू बस कल मुझे छोड़ दे गाँव। दीदी की इस बात ने फिर से किशोर को एक बार झकझोर दिया।
                अगले सुबह किशोर श्रेया दीदी को छोड़ने नहीं जाना चाहता था पर क्या करता उसे जाना ही पड़ा।वहाँ जाने के बाद वह रेणुका से मिला और कहा कि यदि तुम उस दिन मेरी बात समझती तो आज हमारी शादी तय रहती और कल हमारी शादी होती।रेणुका ने किशोर से कहा मुझे माफ़ कर दो किशोर मुझे नहीं पता था कि तुम यहाँ आये थे,और मैं हीं नहीं थी मुझे माफ़ कर दो।किशोर ने कहा अब माफ़ी मांगने से कुछ नहीं होगा कल तुम्हारी शादी है बेहतर यही होगा तुम भूल जाओ मुझे।रेणुका ने पूछा क्या तुम भी भुला पाओगे मुझे? किशोर कुछ नहीं बोला रेणुका ने फिर यही पूछा किशोर ने कुछ भी जवाब नहीं दी और आ गया।
                रेणुका के पिताजी ने उससे कहा कि कल रेणुका की शादी है आप आये हैं तो रहिएगा शादी के बाद ही जाइयेगा।उसने कहा चाचाजी छोड़ दीजिये मुझे, मैं नहीं रह पाउँगा माँ की तबियत खराब है मैं नहीं रुक पाउँगा।किशोर दीदी के यहाँ से आ गया अंतिम बार रेणुका से मिलकर।वह उन लम्हों को भूल जाना चाहता था लेकिन भुला नहीं पाता था।इधर रेणुका की भी शादी हो गई।
……….  ... ... ... …………….जारी है।
- रंजन कश्यप
नोट-इस कहानी का किसी भी वास्तविक जीवन से कोई सम्बन्ध नहीं है यह सब महज़ एक कल्पना पर आधारित है। किसी भी वास्तविक जीवन से संबंध एक संयोगमात्र है।

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